मंगलवार, 22 मई 2012

रूहानियत के बादशाह ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती

अजमेर का नाम दुनिया भर में रोशन कर देने वाले सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का जन्म तो सीस्तान (अब अफगानिस्तान में) हुआ था लेकिन इनकी दरगाह इसी शहर में है। यहीं इनका सालाना उर्स मनाया जाता है जिसमें लाखों जायरीन अकीदत के फूल चढ़ाने आते हैं। आपका जीवनकाल सन् 1133 से 1243 ई. बताया जाता है (टेल्स ऑफ मिस्टिक ईस्ट, राधास्वामी प्रकाशन, पृ. 284) आपकी पीर परस्ती बेमिसाल थी। अपने पीर हजरत हारून चिश्ती को आपने अल्लाह मानकर उनकी खिदमत की।
एक बार हजरत उस्मान हारूनी अपने अनेक शिष्यों को लेकर धार्मिक यात्रा पर निकले। बीच में कहीं एक मंदिर आया। आप बोले - मैं भीतर जा रहा हूँ, तुम लोग बाहर मेरा इन्तजार करना। उधर आधे मुरीद तो उनके मंदिर में जाने से ही खफा होकर चले गए। फिर हुआ यह कि वे नौ माह तक भीतर ही रहे। उनकी प्रतीक्षा करते-करते बचे हुए सारे शिष्य थक कर चले गये, केवल मोईनुद्दीन चिश्ती ही वहां डटे रहे। मंदिर से बाहर आने पर उन्हें सच्चाई का पता चला। अपने उस अडिग मुरीद को उन्होंने गले लगाया और तत्काल भीतर से रोशन कर दिया। पीर ने उनको धीरे-धीरे रूहानियत के उच्चतम मुकाम पर पहुँचा दिया। यही कारण है कि आज लगभग आठ सौ साल बीत जाने के बाद भी दुनिया उनकी दीवानी है। एक लाख जायरीन प्रतिमाह उनके मजार पर सिर झुकाने आते हैं। हर शख्स की मुराद यहां पूरी होती है।
सुना जाता है कि एक बार आपने बड़े पीर साहब अब्दुल कादिर गिलानी के समक्ष कव्वाली सुनने की इच्छा जाहिर की। बड़े पीर साहब के कादरिया सिलसिले में कव्वाली का रिवाज नहीं था फिर भी उन्होंने ख्वाजा साहब की तमन्ना पूरी की - एक मृत कव्वाल की कब्र खोली, उसकी देह में रूह प्रविष्ट की, नहलाकर कपड़े पहनाए और उसे कव्वाली सुनाने का आदेश दिया। उस कव्वाल की अदायगी इतनी असरदार थी कि ख्वाजा साहब पर रूहानी मस्ती चढ़ गई। वे मस्ती में नाचने लगे। उनके 'हाल� से जमीन कांपने लगी। तब बड़े पीर साहब ने अपनी छड़ी जमीन पर टिकाकर धरती के कम्पन को स्थिर किया। ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व होने के फलस्वरूप ही ख्वाजा साहब का रूहानी वर्चस्व आज भी कायम है। अजमेर स्थित आपकी दरगाह का जर्रा-जर्रा चैतन्य है। यहां 800 वर्ष से लगातार विस्तारीकरण व सौन्दर्यीकरण का कार्य चल रहा है।
आरम्भ में यहां ख्वाजा साहब का केवल एक कच्चा मजार था। अजमेर के लोक समाज में ऐसी मान्यता है कि उस समय आसपास कुछ बड़े मंदिर व हिन्दू भवन थे जिन्हें पहले एबक और बाद में इल्तुतमश ने नष्ट कर दिया। ख्वाजा की मजार पन्द्रहवीं (1469 ई.) सदी के पूर्वाद्र्ध तक गुमनाम थी किन्तु 1455 ई. में यहां माण्डू के सुल्तान महमूद खिलजी ने 85 फीट ऊँचा बुलन्द दरवाजा बनवाया, फिर उसके पुत्र गियासुुद्दीन खिलजी ने गुम्बद बनवाया। सन्दलखाना व मस्जिद का निर्माण भी उसी समय हुआ बताते हैं। इसके बाद मुगलकाल में यहां का काया कल्प हुआ। बादशाह अकबर ने यहां एक विशाल मस्जिद बनवाई, लंगरखाना बनवाया और बड़ी देग भेंट की, छोटी देग जहांगीर ने नजर की जो ताम्बे की थी। शाहजहां ने जामा मस्जिद बनवाई और जहांआरा ने बेगमी दालान का निर्माण कराया। सन् 1915 में हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खां ने निजाम गेट बनवाया। बड़ी व छोटी देग में क्रमश: 120 मन व 80 मन चावल पकने की क्षमता है। बड़ी देग का घेरा 13 फीट व गहराई दस फीट है तथा चार सूत मोटी लोहे की चद्दरों से इसे बनाया गया था। सन् 1567 व 1612 तक लगातार प्रति वर्ष उर्स के दौरान यह देग शाही खर्च से पकवाई गई थी। इस तरह दरगाह का जो वर्तमान रूप है वह विगत 500 वर्ष के दौरान होते रहे निर्माण कार्य का परिणाम है। यहां चादर चढ़ाने की भी अनूठी प्रथा है जो ईरान, इराक व अरब देशों में भी नहीं है। अपने खादिम के जरिये जायरीन अपनी हैसियत के अनुसार मजार शरीफ पर कीमती चादरें चढ़ाते हैं। बेहद कीमती चादरें दरगाह के तोशाखाना में रख दी जाती है। यहां बादशाह औरंगजेब द्वारा अपने हाथ से लिखी गई कुरान सुरक्षित है। बेगमी दालान से पूरब दिशा में भिश्ती का मजार है। यह मकबरा उसी दिन के बादशाह भिश्ती का है जिसने चौसा के युद्ध के दौरान नदी में डूब रहे हुमायूं की जान बचाई थी। दरगाह के पिछवाड़े झालरा है। अकबर बादशाह के समय तारागढ़ पहाड़ी के उत्तरी उभार और दरगाह के बीच दो बांध बनाकर झालरे का निर्माण किया गया था जिसकी मरम्मत कर्नल डिक्सन के समय (1843-57) कराई गई थी। जामा मस्जिद, दरगाह परिसर में (1638 ई. में) शाहजहां द्वारा दो लाख चालीस हजार रुपए खर्च करके बनवाई गई थी। मस्जिद की जालीदार दीवार पर नुकीले ग्यारब मेहराब हैं। इस मस्जिद के भीतर इमामशाह में स्वर्णाक्षरों से कलमें उत्कीर्ण हैं। यह सम्पूर्ण दरगाह संगमरमर से निर्मित और नयनाभिराम है।
प्रतिवर्ष रजब की एक से छह तारीख तक यहां ख्वाजा साहब का सालाना उर्स मनाया जाता है। विशाल दरगाह में पांच छोटे दरवाजे हैं, दो पूरब में व तीन पश्चिम में। इसका मुख्य द्वार निजाम गेट उत्तर में है। दरगाह सूफी चेतना का शिल्पधाम है। यहां हिन्दू जायरीन अधिक आते हैं। विश्व की और भारत की अनेक नामी हस्तियां यहां की जियारत कर चुकी हैं।
दरगाह शरीफ में दर्शनीय निर्माण कार्य
1. मजारे मुबारक व दरबार शरीफ का निर्माण सुल्तान महमूद खिलजी ने 859 हिजरी में कराया। अकबर बादशाह ने सीपी का कटहरा बनवाया और बाद में शहंशाह शाहजहां ने कटहरे को चांदी का करवा दिया। गुम्बद के ऊपर सोने का कलश रामपुर के नवाब सालवली खान ने पेश किया।
2. जन्नती दरवाजा ख्वाजा साहब के हुजरे (कमरे) में आने-जाने का द्वार था। इस द्वार का यह नाम बाबा फरदुद्दीन गंज शकर ने अपनी अकीदत से रखा था। यह जन्नती दरवाजा ईद व बकरा ईद के अवसर पर एक-एक दिन के लिए खुलता है। ऐसे ही ख्वाजा साहब के उर्स के दौरान एक से छह तारीख तक खुला रहता है। जायरीन इस दरवाजे के सात चक्कर लगाते हैं।
3. बुलन्द दरवाजा सुल्तान महमूद खिलजी ने 1455 ई. में बनवाया। यह जमीन से 75 फीट ऊँचा है।
4. बड़ी देग 1567 ई. में बादशाह अकबर ने भेंट की और उनके पुत्र जहांगीर ने 1613 ई. में छोटी देग नजर की।
5. सुल्तान महमूद खिलजी ने ही मस्जिद संदल खाने का निर्माण करवाया। मजार शरीफ पर पेश करने के लिए संदल यहीं घोटा जाता था।
6. लटियों वाला दालान दरगाह में वह जगह है जहां अकबर ने जहांगीर के मन्नती बाल कटवाये थे।
7. 1570 ई. में अकबर ने विशाल अकबरी मस्जिद का निर्माण करवाया।
8. लंगरखाना वाली जगह पर स्वयं बादशाह अकबर ने फकीरों की पंक्ति में खड़े रहकर मिट्टी के बर्तन में लंगर कबूल किया था। 9. शाहजहां ने यहां सफेद संगमरमर से बेहद खूबसूरत शाहजहांनी मस्जिद का निर्माण कराया। इसी शंहशाह ने 1047 हिजरी में शाहजहांनी गेट बनवाया जहां आजकल नौबतखाना है।
10. मजार शरीफ के पूर्वी दरवाजे से लगा हुआ बेगमी दालान है। इसका निर्माण शहजादी जहांआरा ने 1053 हिजरी में करवाया था। इसके सामने वाले सेहन को आहाता-ए-नूर कहते हैं।
11. अर्काट के नवाब ने 1793 ई. में अर्कट का दालान बनवाया जो कि मजार शरीफ के दक्षिण है।
12. महफिल खाने का निर्माण हैदराबाद के नवाब बशीरूद्दौला ने 1891 ई. में करवाया था।
13. औलिया मस्जिद का निर्माण 1358 हिजरी में कटिहार के रईस चौधरी मोहम्मद बक्ष ने करवाया था। यह वही स्थान है जहां ख्वाजा साहब ने अजमेर में पहले दिन नमाज पढ़ी थी।
14. 1911 ई. में इंग्लैण्ड की क्वीन मैरी ने यहां मजार शरीफ पर हाजरी दी और एक हौज का निर्माण करवाया जिसे क्वीन मैरी हौज कहते हैं।
15. निजाम गेट का निर्माण हैदराबाद के निजाम ने बीसवीं सदी के आरंभ में कराया था।
इस तरह अजमेर स्थित ख्वाजा साहब की दरगाह जन-जन का आस्था धाम है; यह आपसी सद्भाव का मूर्तिमान रूप है; और सूफी चेतना का कालजयी स्मारक है।
-शिव शर्मा
101-सी-25, गली संख्या 29, नई बस्ती, रामगंज, अजमेर
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